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Rosra News:रोसड़ा में निजी नर्सिंग होम की व्यवस्था पर गंभीर सवाल, डिग्री और डॉक्टरों की मौजूदगी की हो जांच

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | रोसड़ा में निजी नर्सिंग होम की व्यवस्था पर सवाल, कथित फर्जी डिग्री, डॉक्टरों की अनुपस्थिति और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी को लेकर उठी जांच की मांग।

रोसड़ा में नर्सिंग होम के नाम पर कैसी चल रही व्यवस्था? डिग्री, डॉक्टर और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर बड़े सवाल

10 सितंबर, Alam Ki Khabar। रोसड़ा शहर और आसपास के इलाकों में निजी नर्सिंग होम और क्लीनिकों की बढ़ती संख्या के बीच उनकी चिकित्सकीय व्यवस्था और निगरानी को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ संस्थानों में ऐसे लोग मरीजों का इलाज कर रहे हैं, जिनकी चिकित्सकीय योग्यता और पंजीकरण की वास्तविकता की जांच होना जरूरी है।

सबसे गंभीर सवाल उन मामलों को लेकर है, जहां चिकित्सकों की डिग्री और योग्यता को लेकर तरह-तरह के दावे किए जाने की बात सामने आ रही है। कुछ जगहों पर BMS जैसी डिग्री का उल्लेख कर इलाज किए जाने की चर्चा है। वहीं, कुछ चिकित्सकों के बारे में विदेश से MBBS की डिग्री होने का दावा किए जाने की बात भी सामने आती है।

इन दावों की सच्चाई क्या है, यह संबंधित डिग्री, मेडिकल रजिस्ट्रेशन और शैक्षणिक दस्तावेजों की आधिकारिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विभाग को ऐसे सभी दावों का सत्यापन कराने की जरूरत है।

नर्सिंग होम में कौन डॉक्टर, किस समय?

निजी नर्सिंग होम को लेकर दूसरा बड़ा सवाल चिकित्सकों की उपलब्धता का है। आरोप है कि कुछ नर्सिंग होम के बोर्ड पर दो-तीन सरकारी या दूसरे चिकित्सकों के नाम लिखे रहते हैं, लेकिन मरीजों को इलाज के समय संबंधित चिकित्सक हमेशा उपलब्ध नहीं मिलते।

यदि किसी संस्थान के बोर्ड पर किसी चिकित्सक का नाम प्रदर्शित किया जा रहा है, तो क्या संबंधित डॉक्टर वास्तव में वहां नियमित रूप से मरीजों को देखते हैं? क्या उनकी लिखित सहमति और वैध पंजीकरण उपलब्ध है? क्या नर्सिंग होम के रिकॉर्ड में उनकी ड्यूटी और विजिट का विवरण दर्ज है?

इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकता है।

सरकारी डॉक्टर का नाम निजी संस्थान के बोर्ड पर क्यों?

यदि किसी निजी नर्सिंग होम के बोर्ड पर सरकारी सेवा में कार्यरत चिकित्सक का नाम इस्तेमाल किया जा रहा है, तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि डॉक्टर की वास्तविक भूमिका क्या है। क्या वह संस्थान से आधिकारिक रूप से जुड़े हैं? यदि जुड़े हैं तो किस क्षमता में? और यदि नियमित रूप से वहां मौजूद नहीं रहते, तो उनका नाम बोर्ड पर किस आधार पर प्रदर्शित किया जा रहा है?

यह स्थिति सिर्फ मरीजों के भरोसे का मामला नहीं है। यह संबंधित विभाग के लिए भी जांच का विषय है।

मरीजों की मजबूरी का फायदा तो नहीं?

निजी नर्सिंग होम और क्लीनिकों में इलाज कराने वाले अधिकांश मरीज अपनी बीमारी और चिकित्सकीय योग्यता की तकनीकी जानकारी नहीं रखते। वे डॉक्टर के नाम के आगे लिखी डिग्री देखकर ही भरोसा कर लेते हैं।

ऐसे में यदि किसी व्यक्ति की वास्तविक योग्यता कुछ और हो और उसके नाम के साथ ऐसी डिग्री लिखी जाए जिससे मरीज उसे विशेषज्ञ या MBBS डॉक्टर समझे, तो इसकी सच्चाई सामने लाना बेहद जरूरी है।

किसी भी चिकित्सक की योग्यता पर सवाल उठाना तभी उचित होगा, जब संबंधित दस्तावेज और आधिकारिक रिकॉर्ड इसकी पुष्टि करें। लेकिन यदि शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तो उन्हें नजरअंदाज करना भी उचित नहीं माना जा सकता।

स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर भी सवाल

सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर है। यदि शहर में निजी नर्सिंग होम संचालित हो रहे हैं तो उनके लाइसेंस, पंजीकरण, डॉक्टरों की योग्यता, मेडिकल काउंसिल पंजीकरण, उपलब्ध सुविधाओं और मरीजों को दी जा रही सेवाओं की नियमित जांच कौन कर रहा है?

यदि जांच होती है तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?

और यदि जांच नहीं हो रही है तो जिम्मेदारी किसकी है?

इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य विभाग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को देना चाहिए।

कागजों की जांच से सामने आ सकती है पूरी तस्वीर

मामले की निष्पक्ष जांच के लिए संबंधित नर्सिंग होम के पंजीकरण दस्तावेज, संचालक की योग्यता, वहां कार्यरत डॉक्टरों की डिग्री, मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबर, डॉक्टरों की वास्तविक उपस्थिति, स्टाफ की योग्यता और उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं की जांच की जा सकती है।

इसके साथ ही जिन चिकित्सकों के नाम बोर्ड पर प्रदर्शित किए गए हैं, उनसे भी यह सत्यापित किया जाना चाहिए कि वे वास्तव में संबंधित संस्थान से जुड़े हैं या नहीं।

जांच सिर्फ कागज पर नहीं, मौके पर भी होनी चाहिए

ऐसे मामलों में केवल नर्सिंग होम संचालक से दस्तावेज मांग लेना पर्याप्त नहीं होगा। अधिकारियों को औचक निरीक्षण करना चाहिए। निरीक्षण के दौरान यह देखा जाना चाहिए कि बोर्ड पर जिन डॉक्टरों के नाम हैं, उनमें से कौन वास्तव में मरीजों को देख रहा है और वहां किस योग्यता वाले लोग चिकित्सा संबंधी कार्य कर रहे हैं।

जरूरत पड़ने पर मरीजों के बयान और इलाज से जुड़े रिकॉर्ड भी जांच का हिस्सा बनाए जा सकते हैं।

अधिकारियों के लिए खुला सवाल

रोसड़ा में यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक चल रहा है तो स्वास्थ्य विभाग को जांच कर स्थिति साफ करनी चाहिए। यदि कहीं नियमों का उल्लंघन मिल रहा है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है?

क्या विभाग के पास रोसड़ा के सभी निजी नर्सिंग होम का अद्यतन रिकॉर्ड है?

क्या सभी डॉक्टरों की डिग्री और मेडिकल रजिस्ट्रेशन की जांच हुई है?

क्या बोर्ड पर लिखे डॉक्टर वास्तव में संबंधित नर्सिंग होम में मरीज देखते हैं?

क्या सरकारी डॉक्टरों के नाम के इस्तेमाल की भी जांच की गई है?

इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।

संपादकीय दृष्टिकोण

स्वास्थ्य सेवा कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां केवल बोर्ड पर बड़ी-बड़ी डिग्रियां लिखकर मरीजों का विश्वास हासिल किया जा सके। यहां एक गलत दावा मरीज की जिंदगी पर भारी पड़ सकता है। इसलिए रोसड़ा में निजी नर्सिंग होम की व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

Alam Ki Khabar का मानना है कि यदि शिकायतें गलत हैं तो जांच के बाद संबंधित संस्थानों को बेदाग साबित किया जाना चाहिए और यदि शिकायतों में सच्चाई मिलती है तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से अपेक्षा है कि वे केवल शिकायत आने का इंतजार न करें, बल्कि रोसड़ा के निजी नर्सिंग होम और क्लीनिकों का औचक निरीक्षण कर चिकित्सकों की योग्यता, पंजीकरण, उपलब्धता और संस्थानों के संचालन की वास्तविक स्थिति की जांच करें।

मरीजों की जिंदगी से जुड़े इस सवाल पर विभाग की चुप्पी से ज्यादा जरूरी है—साफ जांच, स्पष्ट जवाब और दोष मिलने पर कार्रवाई।

यह भी पढ़ें: रोसड़ा और समस्तीपुर में स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी ताजा खबरें Alam Ki Khabar पर पढ़ें।

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